शुक्रवार, सितंबर 30, 2011

सोहराब मोदी

नाटक से फिल्म तक
-राजेश त्रिपाठी

2 नवंबर 1897 को बंबई में जन्मे सोहराब मोदी का बचपन रामपुर में बीता, जहां उनके पिता नवाब के यहां सुपरिंटेंडेंट थे। नवाब रामपुर का पुस्तकालय बहुत समृद्ध था। रामपुर में ही सोहराब मोदी ने फर्राटेदार उर्दू सीखी। अभिनय की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें अपने भाई रुस्तम की नाटक कंपनी सुबोध थिएट्रिकल कंपनी से मिली,जिसमें उन्होंने 1924 से काम करना शुरू कर दिया था। वहीं उन्होंने संवाद को गंभीर और सधी आवाज में बोलने की कला सीखी, जो बाद में उनकी विशेषता बन गयी। कुछ ही समय में वे नाटकों में उन्होंनेप्रमुख भूमिका निभाने लगे। ‘हैमलेट’ और ‘द सोल आफ डाटर’ उनके लोकप्रिय नाटक थे जिनमें उन्होंने अभिनय किया।
बाद में उनका परिवार रामपुर से बंबई चला आया। वहां उन्होंने परेल के न्यू हाईस्कूल से मैट्रिक पास किया। जब ये अपने प्रिंसिपल से यह पूछने गये कि भविष्य में क्या करें, तो उनके प्रिंसिपल ने कहा,-‘तुम्हारी आवाज सुन कर तो यही लगता है कि तुम्हे या तो नेता बनना चाहिए या अभिनेता।’ और सोहराब अभिनेता बन गये। उनकी आवाज की तरह बुलंद थी। अंधे तक उनकी फिल्मों के संवाद सुनने जाते थे।
16 वर्ष की उम्र में वे ग्वालियर के टाउनहाल में फिल्मों का प्रदर्शन करते थे। बाद में अपने भाई रुस्तम की मदद से उन्होंने ट्रैवलिंग सिनेमा का व्यवसाय शुरू किया। फिर अपने भाई के साथ ही उन्होंने बंबई में स्टेज फिल्म कंपनी की स्थापना की। इस कंपनी की पहली फिल्म 1953 में बनी ‘खून का खून’ थी, जो उनके नाटक ‘हैमलेट’ का फिल्मी रूपांतर थी। इसमें सायरा बानो की मां नसीम बानो पहली बार परदे पर आयीं। ‘सैद –ए-हवस’ (1936) भी नाटक ‘किंग जान’ पर आधारित थी। सोहराब मूलतः नाटक से आये थे, यही वजह है कि उनकी पहले की फिल्मों में पारसी थिएटर की झलक मिलती है। ऐतिहासिक फिल्में बनाने में वे सबसे आगे थे। उन्होंने जितनी फिल्में बनायीं, नमें करीब आधा दर्जन फिल्में ऐतिहासिक थीं।

1936 में स्टेज फिल्म कंपनी मिनर्वा मूवीटोन हो गयी और इसका प्रतीक चिह्न शेर हो गया। अपने इस बैनर में उन्होंने जो फिल्में बनायीं वे थीं- आत्म तरंग (1937), खान बहादुर (1937), डाइवोर्स (1938), जेलर (1938), मीठा जहर (1938), पुकार (1939), भरोसा (1940),सिकंदर (1941), फिर मिलेंगे (1942), पृथ्वी वल्लभ ((1943).एक दिन का सुलतान (1945), मंझधार (1947), दौलत (1949), शीशमहल (1950), झांसी की रानी (1953), मिर्जा गालिब (1954), कुंदन (1955 ), राजहठ (1956), नौशेरवा-ए-आदिल (1957), जेलर (1958), मेरा घर मेरे बच्चे (1960), समय बड़ा बलवान (1969)। इसके अलावा उन्होंने सेंट्रल स्टूडियो के लिए ‘परख’ और शैली फिल्म्स के लिए ‘मीनाकुमारी की अमर कहानी’ बनायी।

भारत की पहली टेकनीकलर फिल्म ‘झांसी की रानी’ उन्होंने बनायी थी। इसके लिए वे हालीवुड से तकनीशियन और साज-सामान लाये थे। इसमें झांसी की रानी बनी थीं उनकी पत्नी महताब। सोहराब मोदी राजगुरु बने थे। इस फिल्म को उन्होंने बड़ी तबीयत से बनाया था , लेकिन फिल्म फ्लाप हो गयी। इस विफलता से उबरने के लिए उन्होंने ‘मिर्जा गालिब’ (सुरैया-भारतभूषण) बनायी। यह फिल्म व्यावसायिक तौर पर तो सफल रही ही इसे राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक भी मिला। उन्होंने सामाजिक समस्याओं परभी कुछ यादगार फिल्में बनायीं। इनमें शराबखोरी की बुराई पर बनायी गयी फिल्म ‘मीठा जहर’ और तलाक की समस्या पर ‘डाईवोर्स’ उल्लेखनीय हैं। उनकी सर्वाधिक चर्चित और सफल ऐतिहासिक फिल्म थी ‘पुकार’। इसमें चंद्रमोहन (जहांगीर), नसीम बानो (नूरजहां), सोहराब मोदी (संग्राम सिंह) और सरदार अख्तर की प्रमुख भूमिकाएं थीं।
इस फिल्म को न सिर्फ प्रेस बल्कि दर्शकों से भी भरपूर प्रशंसा मिली। ‘सिकंदर’ में पोरस और ‘पुकार’ में संग्राम सिंह की भूमिका में सोहराब मोदी के अभिनय की बड़ी प्रशंसा हुई।
भारत में ऐतिहासिक फिल्मों को प्रतिष्ठा दिलाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। महताब से उनकी शादी 21 अप्रैल 1946 को हुई, लेकिन मोदी का परिवार उन्हें बहू के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं था इसलिए कई साल उन्हें अलग रहना पड़ा। 1950 में उनके परिवार ने उनकी शादी को स्वीकार कर लिया। 1978 आते-आते 80 साल के मोदा साहब को चलने-फिरने में छड़ी का सहारा लेना पड़ गया था। 1980 में भारत सरकार ने फिल्मों में उनके महान योगदान के लिए उन्हे दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया। उनकी बड़ी ख्वाहिश थी ‘पुकार’ को फिर से बनाने की। लेकिन बीमारी ने ऐसा नहीं करने दिया। 1984 में डाक्टरों ने यह घोषित कर दिया कि उन्हें कैंसर है। तब तक उन्हें खाना निगलने में भी तकलीफ होने लगी थी। 1983 में उन्होंने अपनी आखिरी फिल्म ‘गुरुदक्षिणा’ का मुहूर्त किया था। उसे अधूरा छोड़ 28 जनवरी 1984 को मोदी हमेशा के लिए चिरनिद्रा में निमग्न हो गये। वे बड़े आला तबीयत के इनसान थे। उनका धैर्य भी अपार था। कई बार कलाकार कई रिटेक देते , पर मोदी साहब के चेहरे पर शिकन तक नहीं पड़ती थी।

मंगलवार, अक्टूबर 19, 2010

केदार शर्मा

फिल्म जगत के एक महत्वपूर्ण स्तंभ
-राजेश त्रिपाठी
अमृतसर के जिले के नोरवाल में जन्मे केदार शर्मा के माता-पिता बचपन में यही समझते थे कि उनसे कुछ काम-धाम नहीं हो पायेगा। लेकिन केदार शर्मा तो किसी और धातु के बने थे। उनमें बचपन से ही संघर्ष करने का जज्बा था और थी दिल जिस चीज की हामी भरे सिर्फ वही करने की धुन। वे सपनों की दुनिया यानी फिल्म उद्योग से जुड़ने की ठान चुके थे। अपनी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए पहले वे कलकत्ता आये और फिर वहां से बंबई चले गये। फिल्मों में वे हीरो बनने आये थे लेकिन उनकी बेहद पतली आवाज इस राह में रोड़ा बन गयी। हीरो बनने की अपनी इस ख्वाहिश को बाद में उन्होंने अपने बेटे अशोक शर्मा को ‘हमारी याद आयेगी’फिल्म में हीरो बना कर पूरी की। केदार शर्मा खुद भले ही हीरो न बन पाये हों लेकिन फिल्मी दुनिया को राज कपूर, मधुबाला, गीता बाली, तनूजा और माला सिन्हा जैसे अनमोल सितारे देने का श्रेय उन्हें ही है। उन्होंने ‘चित्रलेखा’, ‘जोगन’, ‘बावरे नैन’, ‘सुहागरात’, ‘हमारी याद आयेगी’ और ‘पहला कदम’ जैसी यादगार फिल्मों का निर्माण-निर्देशन, लेखन और गीत लेखन किया।
      स्टारमेकर केदार शर्मा की निर्देशक के रूप में पहली फिल्म ‘औलाद’ थी। संयोग से यह फिल्म ठीक उसी वक्त रिलीज हुई , जब महबूब खान की ‘औरत’ और वी. शांताराम की ‘आदमी’ रिलीज हुई थी। उस वक्त अपनी इस फिल्म के बारे में बात करते हुए वे अक्सर मजाक में कहा करते थे-‘आदमी’ और ‘औरत’ चाहे किसी के भी हों ‘औलाद’ तो मेरी है। इसके बाद आयी उनकी ‘चित्रलेखा’ इसमें प्रमुख पात्र थीं महताब।  ‘चित्रलेखा’ ‘हिट’ हुई, लोग महताब को भी चाहने लगे। ‘चित्रलेखा’ के बाद शर्मा जी काफी मशहूर निर्देशक हो गये।
केदार शर्मा
       इसके बाद वे रंजीत स्टूडियो की यूनिट में शामिल हो गये। उन दिनों इसके मालिक चंदूलाल शाह थे। शर्मा जी ने श्री शाह से ख्वाहिश जाहिर की कि वे मोतीलाल को हीरो लेकर ‘अरमान’ फिल्म बनाना चाहते हैं। मोतीलाल उन दिनों सुपर एक स्टार थे। उन्होंने शर्मा जी के सामने तीन शर्तें रखीं। लेकिन कुछ दिन उनके साथ काम करने के बाद वे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी शर्तें तोड़ दीं। एक बड़ा मजेदार वाकया है। एक दिन जब मोतीलाल सेट पर नहीं पहुंचे तो उन्होंने उनके घर फोन कर के उनकी माता जी के नाम संदेश दे दिया। दूसरे दिन मोतीलाल ने शर्मा जी से बताया कि किस तरह उनकी मां शर्मा जी की पतली आवाज के चलते उनको लड़की समझ बैठी थीं। यह धोखा मेरे साथ भी मुंबई में हुआ था। यह 1972 की बात है। जब उनसे मिलने के लिए मैंने
दादर के अरोमा होटल से उनके घर फोन किया तो उधर से पतली आवाज सुन कर मेरे मुंह से बरबस निकल गया-आप कौन बोल रही हैं, शर्मा जी को दीजिए ना। उधर से फिर उसी पतली
आवाज ने जवाब दिया-‘मैं केदार शर्मा बोल रहा हूं आप श्रीसाउंड स्टूडियो के मेरे दफ्तर में आ जाइए।’

    ‘गौरी’, ‘विषकन्या’ और ‘विद्यापति’ में पृथ्वीराज कपूर के साथ काम कर के वे उनके अच्छे दोस्त बन गये थे। पृथ्वीराज कपूर ने अपने बेटे राज कपूर को शर्मा जी को सौंपते हुए कहा कि वे उसे कुछ काम सिखायें। राज कपूर शर्मा जी के यहां क्लैपर ब्वाय बन गये। एक दिन वे क्लैप देना भूल कंघी से बाल संवारने लगे। केदार शर्मा को बड़ा गुस्सा आया और उन्होंने उन्हें एक थप्पड़ जड़ दिया। वैसे उस दिन शर्मा जी को यह एहसास हो गया था कि राज कैमरे के सामने आना चाहते हैं। अगले ही दिन उन्होंने राज को अपनी फिल्म ‘नीलकमल’का हीरो बना दिया। इस फिल्म की हीरोइन थीं मधुबाला। यानी शर्मा जी के एक थप्पड़ ने राज कपूर को हीरो बना दिया। मधुबाला जिन्हें वीनस आफ इंडिया कहा जाता था, उस वक्त 13 साल की थीं।

    गीता बाली को पहले वे रद्द कर चुके थे क्योंकि वे संवाद शुद्ध नहीं बोल पाती थीं। बाद में वे उनकी फिल्म ‘सुहागरात’ की हीरोइन बनीं। ‘सुहागरात’ के हीरो भारतभूषण थे जो उन दिनों संघर्ष कर रहे थे। शर्मा जी फिल्मों में जमने के लिए खुद संघर्ष कर चुके थे इसलिए उनको संघर्षरत लोगों की मुसीबत का पता था। माला सिन्हा को गीता बाली शर्मा जी के पास इसलिए लायी थीं ताकि वे उनको कुछ अभिनय सिखा दें। बाद में माला उनकी फिल्म ‘रंगीन रातें’ की हीरोइन बनीं।
   ‘हमारी याद आयेगी’ में उन्होंने तनूजा को हीरोइन बनाया। इसमें हीरो बने उनके वकील बेटे अशोक शर्मा। कहते हैं कि अशोक फिल्म में काम नहीं करना चाहते थे लेकिन शर्मा जी की जिद
के आगे उन्हें झुकना पड़ा। तनूजा बड़ी तुनकमिजाज थीं। मां शोभना समर्थ शर्मा जी के पास उन्हें इस उम्मीद से लायी थीं कि वे उनको स्टार बना दें। तनूजा से ठीक से अभिनय कराने में उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी लेकिन उन्होंने उन्हें स्टार बना ही दिया।
 
  शर्मा जी ने सपना सारंग को हीरोइन लेकर फिल्म ‘पहला कदम’ बनायी लेकिन दुर्भाग्य से वह फिल्म सही ढंग से प्रदर्शित नहीं हो सकी। इसके बाद उसे लेकर कुछ टेली फिल्में भी बनायीं। शर्मा जी की प्रतिभा बहुआयामी थी। वे एक साथ निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, पटकथा लेखक और गीतकार भी थे। उनकी चर्चित फिल्मों में 1950 में आयीं फिल्में ‘बावरे नैन’ और ‘जोगन’ भी हैं। इनके अलावा उनको चोराचोरी,गुनाह, नेकी और बदी, दुनिया एक सराय, चांद चकोरी, धन्ना भगत जैसी
फिल्मों के लिए भी याद किया जाता रहेगा। शर्मा जी 1998 तक फिल्मजगत से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। 29 अप्रैल 1999 को फिल्मजगत के इस महान निर्देशक ने 89 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। बुलंद हौसले और दृढ़निश्चय वाले शर्मा जी फिल्मी किले के एक सुदृढ़ स्तंभ थे।

बुधवार, सितंबर 22, 2010

सामाजिक सरोकार के फिल्मकार

बिमल राय


अपनी शुरू-शुरू की फिल्मों में जमींदारी प्रथा का विरोध करने वाले विमल राय खुद जमींदार परिवार के थे। बिमलचंद्र राय का जन्म 1909 में तत्कालीन पूर्व बंगाल (अब बंगलादेश) के एक गांव के जमींदार परिवार में हुआ था। बंगाल की ग्रामीण लोकधुनों के बीच वे पले-बढ़े , जो बाद में उनकी फिल्मों के संगीत में उभरीं।बचपन से ही उनको फोटोग्राफी का शौक था। अचानक परिवार में आर्थिक संकट आया तो सातों भाई काम की तलाश में कलकत्ता चले आये।
कलकत्ता में न्यू थिएटर्स में प्रशिक्षणार्थी कैमरामैन के रूप में अपनी जिंदगी शुरू करनेवाले विमल दा कुछ ही दिनों में मशहूर निर्देशक नितन बोस के सहायक कैमरामैन बन गये। उनकी योग्यता देख कर पी सी बरुआ ने अपनी फिल्म ‘देवदास’ (कुंदनलाल सहगल, जमुना बरुआ) के छायांकन का भार सौंपा। इसके बाद उन्होंने उनकी कई फिल्मों का छायांकन किया। उन्हें पहली बार निर्देशन का भार बंगला फिल्म ‘उदयेर पथे’ में सौंपा गया।इस क्षेत्र में उन्हें लाने का श्रेय न्यू थिएटर्स के मालिक बी.एन. सरकार को है। बिमल दा ‘उदयेर पथे’ के पटकथा लेखक, छायाकार और निर्देशक थे। इस फिल्म ने अपार सफलता पायी। न्यू थिएटर्स ने जब अपनी यह महत्वाकांक्षी फिल्म हिंदी में बनाने का इरादा किया, तो निर्देशक के रूप में उनके सामने विमल दा का ही नाम आया। यह एक ऐसे आदर्शवादी की कहानी थी, जो पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करता है।
वह स्वतंत्रता संग्राम के दिन थे। सारे देश में क्रांति की लहर आयी थी। विमल दा की फिल्मों ‘अजानगढ़’ और ‘पहला आदमी’ में भी इसका प्रभाव साफ दिखा।
1950 में कलकत्ता से बंबई आ कर उन्होंने बांबे टाकीज के लिए पहली फिल्म ‘मां’ निर्देशित की। उन्होंने शहरों में गरीब तबके के लोगों की दुखभरी जिंदगी देखी थी। इस सबने उनमें प्रगतिवादी विचारधारा पैदा की। उनकी फिल्मों ने व्यवस्था में बदलाव की प्रेरणा दी। वे कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक शाखा से भी जुड़े थे।
विमल राय
1952 में इरोज थिएटर के सामने भारत का पहला फिल्म समारोह आयोजित किया गया। इसे देखने के लिए विमल दा अपनी पूरी यूनिट के साथ आये थे। वे सभी डे सिका की फिल्म ‘बाइसिकिल थीफ’ से बेहद प्रभावित हुए। उसी वक्त उन्होंने सचा कि अगर वे अपना फिल्म प्रोडक्शन शुरू करते हैं, तो उनका उद्देश्य अच्छी फिल्में बनाना होगा। इसी बीच उन्हें मोहन स्टूडियो के मालिक रमणीकलाल शाह की ओर से एक आफर मिला। वे अपने दोस्त दलीचंद शाह के लिए एक कम बजट की फिल्म बनाना चाहते थे। विमल दा ने एक शर्त रखी कि फिल्म विमल राय प्रोडक्शंस के बैनर में बनेगी और निर्माण के दौरान उनके काम में किसी तरह की दखलंदाजी नहीं की जायेगी। उनकी शर्त मान ली गयी। उनकी यूनिट में उन दिनो हृषिकेश मुखर्जी भी थे। उन्होंने सलिल चौधरी की लिखी बंगला कहानी ‘रिक्शावाला’ पढ़ी थी। वह कहानी विमल दा को बहुत भायी थी। इस पर ही ‘ दो बीघा जमीन’ बनाने का निश्चय किया गया। सलिल चौधरी ने इस फिल्म से संगीतकार के रूप में जुड़ना चाहा। वे फिल्म के कहानीकार भी थे, उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया गया।
इसके बाद शंभू महतो की भूमिका के लिए उपयुक्त कलकार के चुनाव का सवाल आया। कई नामों पर विचार करने के बाद यह भूमिका बलराज साहनी को देने का निश्चय किया गया। ‘दो बीघा जमीन’ में उन्होंने शंभू महतो की भूमिका में बहुत ही सशक्त और जीवंत अभिनय किया। उनके साथ इस फिल्म में हीरोइन थीं निरुपा राय इसके बाद आयी ‘परिणीता’( अशोक कुमार, मीना कुमारी)। यह एक प्रेमकथा थी जिसके माध्यम से जाति-वर्ग के झूठे दायरों पर चोट की गयी थी। उन्होंने ‘बिराज बहू’ , ‘बाप बेटी’ तथा ‘नौकरी’ आदि फिल्में दीं। उनके बैनर की जिन फिल्मों को दूसरे निर्देशकों ने निर्देशित किया वें थीं-‘अमानत’, ‘परिवार’, ‘अपराधी कौन’, ‘उसने कहा था’, ‘बेनजीर’, ‘काबुलीवाला’, ‘दो दूनी चार’ और ‘चैताली’।
1955 में उन्होंने बड़े सितारों दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन, मोतीलाल और वैजंयतीमाला को लेकर ‘देवदास’ बनायी। यह फिल्म बहुत हिट रही। उनकी ‘मधुमती’ (दिलीप कुमार , वैजयंतीमाला) पुनर्जन्म की कथा पर आधारित फिल्म थी। इसने अपार सफलता पायी और इसके गीत भी बेहद हिट हुए। 1959 में उन्होंने अस्पृश्यता की कथावस्तु पर ‘सुजाता’ फिल्म बनायी। नूतन, सुनील दत्त, शशिकला और ललिता पवार की प्रमुख भूमिकाओंवाली इस फिल्म ने भी सफलता के नये कीर्तिमान बनाये। इसकी प्रशंसा पंडित जवाहरलाल नेहरू तक ने की थी। इसके बाद विमल दा की ख्याति और भी बढ़ गयी। वे विदेश फिल्मों के प्रतिनिधि मंडल के साथ जाने लगे। ‘परख’, ‘प्रेमपत्र’ बनाने के बाद उन्होंने 1963 में ‘बंदिनी’ बनायी। इसमें अशोक कुमार, नूतन और धर्मेंद्र ने यादगार अभिनय किया। यह विमल दा की अंतिम यादगार फिल्म थी। विमल दा की फिल्मों का गीत-संगीत पक्ष भी बहुत सशक्त होता था।

बुधवार, अगस्त 25, 2010

छोटा कद. बुलंद हौसला

महबूब खान

राजेश त्रिपाठी
छोटे कद और बुलंद हौसले वाले महबूब खान का जन्म गुजरात में बड़ौदा जिले के अंतर्गत एक छोटे से गांव सरार काशीपुर में 7 सितंबर 1906 को हुआ था। लिखने-पढ़ने के नाम पर वे सिर्फ उर्दू में अपना हस्ताक्षर करना भर जानते थे।चेकों पर भी वे लोगों के नाम नहीं लिख पाते थे। बस सिर्फ हस्ताक्षर कर देते थे। शायद यही वजह है कि उन्होने इतनी फिल्में बनायीं , लेकिन किसी की भी स्क्रिप्ट वे साथ नहीं रखते थे। सारा कुछ उनके दिमाग में होता था। कहते हैं कि एक बार कोई अनपढ़ उनसे काम मांगने आया तो कहीं आर काम दिलाने का वादा करते हुए उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा-‘मैं अपने गिर्द और अनपढ़ नहीं रखना चाहता। एक ही काफी है। ’ जाहिर है उनका इशारा अपनी ओर था।

जब वे इक्कीस साल के थे तभी उन्हें फिल्मों में काम पाने की ललक हुई। वैसे फिल्मों में वे पहले ले ही दिलचस्पी लेते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि वे 1927 में घर से भाग कर बंबई चले आये। वहां किसी दोस्त की सहायता से उन्होंने उन दिनों की मशहूर फिल्म निर्माण कंपनी इंपीरियल में 30 रुपये माहवार पर साधारण-सी नौकरी कर ली। वे आये थे फिल्म अभिनेता बनने और उनकी यह ख्वाहिश सागर मूवीटोन की पहली सवाक फिल्म ‘मेरी जान’ ने पूरी की। इसमें वे हीरोइन जुबेदा के छोटे भाई बने थे। पूरी फिल्म में उन्हें खलनायक याकूब के कोड़े खाने पड़े थे। वे आठ साल तक कलाकार के रूप में काम करते रहे। इंपीरियल कंपनी में अपनी योग्यता का परिचय देने के बाद, महबूब खान ने सागर मूवीटोन की फिल्मों का निर्देशन किया। सागर मूवीटोन के लिए उनके द्वारा िनर्देशित फिल्में थीं-अल हिलाल, डेक्कन क्वीन,मनमोहन, जागीरदार, वी थ्री (हम तुम और वह), वतन। 1939 में बनी ‘एक ही रास्ता’ से उन्हें बड़ी ख्याति मिली। सागर मूवीटोन के साथ उनकी आखिरी फिल्म थी ‘अलीबाबा’। इसके बाद सागर मूवीटोन नेशनल स्टूडियो लिमिटेड में मिल गया। इस नयी कंपनी का प्रोडक्शन इनचार्ज महबूब को बनाया गया।

महबूब खान
इस नयी कंपनी के साथ उनकी पहली फिल्म थी ‘औरत’। यह किसानों की परेशानी दरसानेवाली ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म थी। इसका आधार था पर्ल बुक का मशहूर उपन्यास ‘द मदर’। ‘औरत’ में प्रमुख भूमिका सरदार अख्तर ने निभायी थी, जो बाद में श्रीमती महबूब खान बन गयी थीं। अख्तर महबूब की दूसरी पत्नी थीं। ‘औरत’ फिल्म को उन्होंने 1955 में अपने बैनर महबूब प्रो़डक्शन के अंतर्गत ‘मदर इंडिया’ के नाम से बनाया। इसमें उन्होंने सरदार अख्तर वाली भूमिका नरगिस को दी। अन्य भूमिकाएं राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त, राजकुमार, कन्हैयाला और कुमकुम को दीं। इसी फिल्म के निर्माण के दौरान सुनील दत्त और नरगिस की मुहब्बत परवान चढ़ी और ‘मदर इंडिया’ की कामयाबी के बाद ही नरगिस-सुनील ने शादी कर ली। यह फिल्म ‘आन’ के बाद बनी महबूब प्रोडक्शन की दूसरी टेकनीकलर फिल्म थी। यह विदेश में भी खूब चली।

‘औरत’ के बाद नेशनल स्टूडियो के लिए उन्होंने ‘बहन’, ‘नयी रोशनी’ ‘जवानी’, ‘निर्दोष’, ‘रोटी’ बनायी। ‘रोटी’ के क्लाइमैक्स दृश्य में चंद्रमोहन को पता लगता है कि उसके पास बक्सा भर सोने की ईंटे हैं लेकिन खाने को एक दाना नहीं। इससे वे संदेश देना चाहते थे कि अगर पैसे से रोटी न खरीदी जा सके, तो वह पैसा बेकार है। ‘रोटी’ के बाद नेशनल स्टूडियो के.के. मोदी ने ले लिया और महबूब खान ने अपनी निर्माण संस्था महबूब प्रोडक्शंस शुरू की, जिसका प्रतीक चिह्न था हंसिया –हथौड़ा। इसके अंर्गत उनके द्वारा बनायी गयी पहली फिल्म थी ‘नजमा’ जिसमें मुसलमानों की सामाजिक स्थिति का चित्रण था। इसमें नवागता वीणा को पेश किया गया था। और बांबे टाकीज के बाहर अशोक कुमार की यह पहली फिल्म थी। इसके बाद महबूब खान ने ‘तकदीर’ बनायी। यह नरगिस की पहली फिल्म थी। उस वक्त उनकी उम्र 14 साल थी। ‘तकदीर’ के बाद ऐतिहासिक फिल्म ‘ हुमायूं’ आयी। फिर उन्होंने तीन ऐसे कलाकारों-सुरेंद्र, सुरैया, नूरजहां- को लेकर ‘अनमोल घड़ी’ बनायी जो अपने गीत खुद ही गा सकते थे। इस फिल्म के गाने नौशाद ने संगीतबद्ध किये जो बहुत ही लोकप्रिय हुए।

महबूब खान ने ‘ऐलान’, ‘अनोखी अदा’, ‘ अंदाज’ ßनरगिस, दिलीप कुमार, राज कपूर) बनायी। ‘अंदाज’ के गीत भी बहुत हिट हुए। इसके बाद उन्होंने अपनी पहली पहली टेक्नीकलर फिल्म ‘आन’ बनायी। इसमें दिलीप कुमार, प्रेमनाथ, निम्मी और नादिरा (जिसकी यह पहली फिल्म थी) की प्रमुख भूमिकाएं थीं। यह फिल्म देश-विदेश में सर्वत्र बेहद कामयाब रही। इससे हुई कमाई से ही उन्होंने बांद्रा में अपना महबूब स्टूडिो खड़ा किया। इस स्टूडियो में उनकी पहली फिल्म थी ‘ अमर’ जिसमें दिलीप कुमार, मधुबाला और निम्मी की प्रमुख भूमिकाएं थीं।उन्होंने एक फिल्म ‘सन आफ इंडिया’ बनायी इसमें मास्टर साजिद, सिमी, कुमकुम व कंवलजीत की मुख्य भूमिकाएं थीं। यह फिल्म इतनी बुरी तरह फ्लाप हुई कि उनके हौसले पस्त हो गये। वे टूट गये। उनके पास स्टूडियो की साज-संभाल के लिए भी पैसे नहीं रहे। वे दिल के मरीज थे। 27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु की खबर पाकर उन्हें गहरा सदमा पहुंचा। उन्हें तत्काल दिल का दौरा पड़ा और वे हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गये। नरगिस, नलिनी जयवंत, वीना और शेख मुख्तार को परदे पर लाने का श्रेय उन्हें ही है। मजहब के बड़े पक्के थे और पांच वक्त नमाज पढ़ते थे। (आगे पढ़ें)

मंगलवार, अगस्त 03, 2010

इस तरह साकार हुआ हिंदुस्तानी फिल्मों का सपना

    -राजेश त्रिपाठी
  17 मई 1913 को बंबई के पारेख अस्पताल के अहाते में कोरोनेशन थिएटर में यह फिल्म प्रदर्शित की गयी। और इस तरह इस फिल्म से ही भारतीय फिल्मों का जन्म हुआ। यह फिल्म आठ सप्ताह चली। उन दिनों रंगमंच बेहद लोकप्रिय था , उससे इस फिल्म को कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि बंबई के बाहर यह फिल्म नहीं चली। सूरत (गुजरात) में दादा साहब ने एक व्यवसायी के साझे में यह फिल्म उस मंच पर दिखायी, जहां नाटक होते थे लेकिन यह कोशिश भी बेकार रही। पहले दिन महज तीन रुपये आये। चलती-फिरती गूंगी फिल्में देखने के बजाय लोग नाटक देखना पसंद करते थे। इसके बाद दादा साहब ने अपनी फिल्म का आकर्षक विज्ञापन देना शुरू किया। इसका काफी असर हुआ और एक शो के 300 रुपये तक आने लगे। दादा साहब बंबई छोड़ कर नासिक चले गये। वहां उन्होने ‘भस्मासुर मोहिनी’ बनायी। फिल्म विफल रही। अपनी अगली फिल्म ‘सत्यवान सावित्री’ बनाने के लिए उन्हें अपनी पत्नी के गहने तक बेचने पड़े। इस बीच उन्होंने कई वृत्तचित्र भी बनाये। ‘सत्यवान सावित्री’ बनाने के बाद वे अपनी तीनों फिल्में लेकर इंग्लैंड गये। वहां उन्होंने अपनी फिल्मों का प्रदर्शन किया। लोग उनसे बहुत प्रभावित हुए। वहां की एक फिल्म कंपनी के मालिक ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि उसके साथ साझे में इंग्लैंड में ही भारतीय फिल्मों का निर्माण करें लेकिन दादा के मन में तो भारतीय फिल्मों की बुनियाद पुख्ता करने की धुन थी।
स्वदेशलौट कर उन्होंने ‘लंका दहन’ बनायी जो न सिर्फ बंबई अपितु देश के अन्य भागों में भी बेहद कामयाब रही। अब तक उन्होंने सारी फिल्में अपने बैनर फालके फिल्म कंपनी के अंतर्गत बनायी थीं। इसके बाद कई धनवान लोगों ने उनके इस व्यवसाय में साझे का प्रस्ताव रखा। दादा ने यह प्रस्ताव मान लिया। इस तरह से हिंदुस्तान कंपनी का जन्म हुआ। इस कंपनी के बैनर में उन्होंने ‘कृष्म जन्म’ बनायी और अपना वर्षों पुराना सपना पूरा किया। यह फिल्म बहुत सफल रही। इसके बाद उन्होंने ‘कालिया मर्दन’ बनायी जिसमें उनकी बेटी मंदाकिनी ने बाल कृष्ण की भूमिका बड़ी खूबी से की। फिल्म लागातार 10 महीने तक चली। इसके बाद अपने साझेदारों से उनका झगड़ा हो गया । वे फिल्म छोड काशी यात्रा पर चले गये। काफी अरसे बाद वे फिल्मों में वापस आये यौर उन्होंने ‘सती महानंदा’ और ‘सेतुबंधन’ बनायी। यह उनका आखिरी मूक फिल्म थी जिसे बाद में ध्वनि से जोड़ कर सवाक कर दिया गया। दादा साहब फालके द्वारा बनायी गयी पहली और आखिरी सवाक फिल्म थी ‘गंगावतरण’ । इसके बाद उम्र अधिक हो जाने के कारण उन्होंने फिल्में छोड़ दीं। उन्होंने कुल 175 फिल्में बनायीं और खूब धन कमाया लेकिन सब कुछ गंवा दिया। उनीक जिंदगी के आखिरी दिन बेहद तंगी में गुजरे। उन दिनों वी. शांताराम ने उनकी बड़ी आर्थिक मदद की। 16 फरवरी 1944 को भारतीय फिल्मों के इस शलाका पुरुष ने 74 वर्ष की उम्र में नासिक के अपने घर में आखिरी सांस ली। (आगे पढ़े)