बुधवार, जुलाई 07, 2010

दादा साहब फालके

जिन्होंने भारतीय सिनेमा की बुनियाद रखी
-राजेश त्रिपाठी

जिन लोगों ने भारत में फिल्मों की बुनियाद रखी, उनमें अग्रणी थे दादा साहब फालके। धुंडिराज गोविंद फालके उर्फ दादा साहब फालके का जन्म 30 अप्रैल 1870 को, महाराष्ट्र में नासिक के करीब त्रयंबकेश्वर में हुआ था। भारतीय फिल्मों के जनक दादा साहब फालके एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। उन्हें बचपन से ही फोटोग्राफी का शौक था। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वो फोटोग्राफी सीखने विदेश चले गये। स्वदेश लौट कर उन्होंने एक फोटोग्राफर की हैसियत से पुरातत्व विभाग में नौकरी कर ली। उन दिनों भारत में तो फिल्में बनती नहीं थीं, हां विदेशी फिल्में जरूर दिखायी जाती थीं। उन्हीं दिनों उन्होंने ऐसी ही एक विदेशी फिल्म ‘द लाइफ आफ क्राइस्ट’ देखी। इस फिल्म ने जैसे उनकी जिंदगी की धारा ही बदल दी। दादा साहब देख तो रहे थे क्राइस्ट की जिंदगी लेकिन उनके दिमाग में रह रह कर यह विचार कौंधता था कि काश! क्राइस्ट की जगह कृष्ण होते। और यह बात उनके दिमाग में घर कर गयी कि वे कृष्ण के जीवन पर ऐसी ही फिल्म बनायेंगे। यह सोचना जितना आसान था, इसे पूरा करना उतना ही मुश्किल। कारण, तब तक भारत में किसी को फिल्म तकनीक की जानकारी नहीं थी। न सिनेमा के साज-सामान थे, न उन्हें चलानेवाले कुशल तकनीशियन। लेकिन दादा साहब दृढ़प्रतिज्ञ थे।
अपना सपना पूरा करने के लिए उन्होंने कृष्ण से संबंधित साहित्य पढ़ने में दिन-रात एक कर डाला। ऐसे में उन्होंने यह परवाह भी नहीं की कि वे अपनी आंखों के साथ ज्यादती कर रहे हैं। लेकिन सिर्फ इतने से ही बात नहीं बननी थी। सिनेमा तकनीक का ज्ञान जरूरी था। दादा साहब पशोपेश में थे। तभी उनके हाथ एक किताब लग गयी ‘ द ए बी सी आफ सिनेमैटोग्राफी’। इससे ही उन्हें सिनेमा कला की पहली जानकारी मिली। इसके बाद तकनीकी ज्ञान के लिए अपनी जीवन बीमा पालिसी बंधक रख कर वे इंग्लैंड गये। वहां से वे दो माह बाद एक विलियम्सन कैमरा , एक प्रिंटिंग मशीन व अन्य यंत्र ले कर लौटे ।इन सीमित साधनों से ही उन्होंने फिल्म निर्माण की तैयारी शुरू कर दी।
मुश्किल यह थी कि उन दिनों कोई फिल्मों पर पैसा लगाने को तैयार नहीं था। किसी को यकीन नहीं था कि भारत में भी फिल्में बन सकती हैं। इस बात का यकीन दिलाने के लिए उन्होंने एक काम किया। उन्होंने गमले में सेम के कुछ बीज बोये और अपने कैमरे के जरिये बीज के अंकुरित होने से लेकर क्रमिक विकास को फिल्मा लिया। अपनी इस लघु फिल्म का नाम उन्होंने ‘द ग्रोथ आफ ए प्लांट’ रखा। इसे उन्होंने कुछ लोगों को दिखाया। लोग उनके प्रयास से बहुत प्रभावित हुए और उनकी आर्थिक मदद से दादा साहब ने अपनी पहली फीचर फिल्म बनाने की योजना शुरू की।

अपनी पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ के लिए उन्होंने धार्मिक कथा चुनी। इस मूक फिल्म को बनाने में उन्हें बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सबसे ज्यादा परेशानी तो उन्हें हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती की भूमिका निभानेवाली महिला कलाकार को खोजने में हुई। उन दिनों कुलीन घराने की पढ़ी-लिखी महिलाएं नाटकों और फिल्मों में काम करने का साहस नहीं करती थीं। इस काम को बहुत तुच्छ माना जाता था। तारामती की तलाश उन्हें बंबई के वेश्याओं के मुहल्ले तक ले गयी लेकिन वे भी फिल्म में काम करने को तैयार नहीं थीं। वे भी इसे निकृष्ट काम समझती थीं। किसी ने तो यहां तक कहा कि अगर वह फिल्म में काम करेगी तो उसे उसके समाज से निकाल दिया जायेगा। एक ने तो यह भी कहा कि अगर दादा साहब उसकी बेटी से शादी कर लें तो वह उसकी बेटी फिल्म में काम कर सकती है। हार कर दादा साहब ने तय किया कि वे किसी पुरुष कलाकार को ही तारामती बनायेंगे। लेकिन यहां भी समस्या आयी। कोई अपनी मूंछ मुंडाने को तैयार नहीं था। बहुत अनुनय-विनय के बाद दादा साहब इसके लिए एक युवक को राजी कर पाये। जहां आज दादा साहब फालके रो़ड है , बंबई की उसी जगह पर दादा साहब ने अपनी इस फिल्म की शूटिंग शुरू की। फिल्म की सारी शूटिंग दिन में सूरज की रोशनी में की गयी। 3700 फुट लंबी यह फिल्म आठ महीने में पूरी हुई। उन दिनों सेट आदि बनाने का इंतजाम तो था नहीं, इसलिए किले आदि के दृश्य परदे पर बना कर ठीक उसी तरह पीछे टांग दिये जाते थे , जैसा नाटकों में किया जाता था। इसके निर्देशक, निर्माता, लेखक, कला निर्देशक, छायाकार, मेकअप मैन सभी कुछ दादा साहब ही थे। इस फिल्म में हरिश्चंद्र की भूमिका डाबके ने और तारामती की भूमिका सालुंके ने की थी। रोहित की भूमिका खुद दादा साहब के बेटे भालचंद्र ने की थी।(क्रमशः)

बुधवार, जून 02, 2010

घुमंतू सिनेमाघरों से मल्टीप्लेक्स तक का सफर

 हिंदी सिनेमा का इतिहास-13
-राजेश त्रिपाठी
कई पड़ावों से गुजरता भारतीय सिनेमा ‘छोटा चेतन’ और ‘शिवा का इंसाफ’ में थ्री डी (त्रिआयामी) पद्धति को भी आजमा चुका है। इनमें ‘छोटा चेतन’ ने कामयाबी पायी और ‘शिवा का इंसाफ’ की विफलता ने इन फिल्मों की राह रोक दी। बहरहाल , आज एक फिल्म को बनाने में एक वर्ष से भी अधिक वक्त लग जाता है। बहुचर्चित फिल्म ‘मुगले आजम’ को पूरा होने में 12 वर्ष से भी अधिक वक्त लग गया था। जब यह फिल्म पूरी होने को आयी, तब तक रंगीन फिल्मों की धूम मच गयी थी। मजबूरन के. आसिफ को इसका शीशमहलवाला दृश्य रंगीन करना पड़ा था। ‘पाकीजा’ भी 10 साल आसानी से खींच ले गयी। लेकिन पहले के दिनों में साल में तीन-चार फिल्में बन जाती थीं। कारण न तो रिटेक ही ज्यादा होते थे न डबिंग के लिए सितारों का इंतजार ही करना पड़ता था। दर्शक किसी फिल्म को बार-बार देखने के बजाय नयी फिल्म देखना पसंद करते थे। उन दिनों सबसे कम समय में बननेवाली फिल्म थी मोहन स्टूडियो की ‘ ईद का चांद’, जिसके निर्देशक ए.एम. खान थे।
फिल्मों के निर्माण में प्रतिस्पर्धा तब से शुरू हुई जब से स्टूडियो पद्धति समाप्त हुई।पहले वही फिल्में बनाने के धंधा करते थे, जिनके पास अपने स्टूडियो होते थे। कलाकार और तकनीशियन उस स्टूडियो के वेतनभोगी कर्मचारी हुआ करते थे। इस पद्धति को तब धक्का लगा, जब सी.एन. त्रिवेदी नाम के एक निर्माता ने अभिनेता मोतीलाल को अनुबंधित किया और स्टूडियो भाड़े पर लेकर फिल्म बनाना शुरू कर दिया। त्रिवेदी से प्रेरणा पाकर ऐसे और लोग भी इस धंधे में आ गये, जिनके पास पैसे तो थो, पर अपने स्टूडियो नहीं थे। ये लोग कलाकारों का चयन करते, स्टूडियो भाड़े पर लेते और फिल्म बना डालते। इसका प्रभाव अन्य निर्माताओं पर भी पड़ा। कलाकारों के लिए फ्रीलांसिंग का सिलसिला शुरू करने का श्रेय पृथ्वीराज कपूर को जाता है। उसके बाद से कलाकार एक फिल्म कंपनी के बंधे हुए कर्मचारी न होकर बाहरी पिल्म कंपनियों की फिल्मों में भी काम करने लगे। वे जितनी चाहे पिल्में करने को स्वतंत्र हो गये। इसका प्रभाव फिल्मों के स्तर पर भी पड़ा। तभी से कहानी गौण हो गयी और मनोरंजन प्रधान हो गया।
स्वाधीनता संग्राम के वक्त भी फिल्मों में कुछ बदलाव आया था। अंग्रेजी शासन के कारण पहले फिल्मों में शराबखोरी तथा पथभ्रष्ट करने वाले जो दृश्य दिखाये जाते थे, वे बंद हो गये थे। यह देश में नव जागरण के परिप्रेक्ष्य में जनाक्रोश उमड़ने की आशंका से हुआ था। 1942 के आंदोलन का प्रभाव भी फिल्मों पर पड़े बगैर नहीं रहा। दूसरा परिवर्तन आजादी के बाद देखा गया। 1947 के आसपास निर्माताओं ने देश भक्ति पर जितनी फिल्में बनायीं थीं, उतनी फिर कभी नहीं बनीं।
आजादी के पहले तक देश की फिल्मों मे जहां अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपरा की छाप थी, वहीं बाद की फिल्मों में यह सब गायब हो गयी। हमारी फिल्मों में पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति ऐसी हावी हो गयी कि अब तो फिल्में पूरी तरह से उसी रंग में रंग गयी हैं।
श्वेत-श्याम फिल्मों के बाद 1937 में पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या’ बनी। इसके निर्माता निर्देशक अर्देशिर ईरानी इसके बाद सोहराब मोदी ने टेक्नीकलर में ‘झांसी की रानी’ का निर्माण किया। यह फिल्म बुरी तरह से फ्लाप हुई। भारत की तीसरी रंगीन फिल्म महबूब खान की ‘आन’ थी, जो काफी हिट रही। इन दोनों फिल्मों की प्रोसेसिंग विदेश में हुई थी। इसके बाद गेवाकलर , फूजीकलर और इस्टमैनकलर आया।
इन पड़ावों से गुजरता वयस्क होता भारतीय सिनेमा अब एक उद्योग का रूप धारण कर चुका है और इसके लिए उद्योग के दर्जे की मांग भी की जा रही है। यह मांग वर्षों से की जा रही है क्योंकि अगर यह मांग मान ली जाती है तो इसकी समस्याओं को देखने के लिए एक अलग मंत्रालय की व्यवस्था हो सकेगी। केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड अब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड हो गया है। कई फिल्में अब यहां भी अटकती हैं ।आज फिल्म उद्योग चौतरफा मुसीबत से घिरा है। एक ओर फिल्म का बढ़ता व्यय उसकी रीढ़ तोड़ रहा है तो दूसरी ओर वीडियो कैसेट की तस्करी और वीडियो के प्रसार के चलते मल्टीस्टारर फिल्में तक बाक्स आफिस में मुंह की खा रही हैं। टेलीविजन चैनलों के प्रसार से भी फिल्मों के व्यवसाय को फर्क पड़ा है लेकिन सच यह भी है कि 51 सेंटीमीटर का
परदा सिनेमाघरों का विकल्प नहीं हो सकता। फिल्में आज भी हैं और आने वाले दिनों में भी इनका वजूद रहेगा। अब तो मल्टीप्लेक्सों का चलन है जहां आप एक जगह एक साथ कई फिल्में देख सकते हैं। फिल्मों में भी अब नयी तकनीक का दिनोंदिन प्रचलन होने लगा है। (आगे पढ़ें)

बुधवार, मई 26, 2010

बहुचर्चित समांतर सिनेमा की भी अकाल मौत हुई

हिदी सिनेमा का इतिहास -12
- राजेश त्रिपाठी

सफल बाल फिल्मों में ‘मुन्ना’ , ‘अब दिल्ली दूर नहीं’, ‘बाप बेटी’, ‘किताब’ (1970, निर्देशक गुलजार) और ‘जागृति’ (निर्देशक सत्येन बोस) का नाम लिया जा सकता है।
गुलजार ने जहां एक ओर ‘परिचय’ जैसी साफ-सुथरी फिल्म दी, वहीं उन्होंने ‘कोशिश’ में गूंगे-बहरों की समस्या को उभारने की ईमानदार कोशिश की। इस फिल्म में संजीव कुमार और जया भादुड़ी का अभिनय बहुत ही प्रशंसनीय रहा। गुलजार ने युवा-विद्यार्थी असंतोष पर ‘ मेरे अपने’ फिल्म बनायी। इसी कथानक पर पहले तपन सिन्हा बंगला में ‘अपनजन’ के नाम से फिल्म बनायी थी।
नशीली चीजों की तस्करी और इनके इस्तेमाल पर रामानंद सागर की फिल्म ‘चरस’ और देव आनंद की ‘हरे राम हरे कृष्ण’ का नाम लिया जा सकता है। सेक्स की थीम पर वी. शांतराम की ‘पर्वत पर अपना डेरा’, देवकी बोस की ‘नर्तकी’ (1940), केदार शर्मा ‘जोगन’ (1950) और बाद में उनकी ही ‘चित्रलेखा’ (1941, 1964), न्यू थिएटर्स की ‘मुक्ति’ आदि फिल्में बनीं। सेक्स शिक्षा के नाम पर बी. के. आदर्श ने ‘गुप्त ज्ञान’, ‘गुप्त शास्त्र‘ जैसी फूहड़ फिल्में पेश कीं, तो पैसा कमाने के लिए ऐसी फिल्मों का सिलसिला शुरू हो गया, जिनकी कड़ी थीं ‘कामशास्त्र’ , ‘स्त्री पुरुष’ और ‘मन का आंगन’ आदि।
ग्रामीण समाज में व्याप्त सूदखोरों के जुल्म पर महबूब खान की ‘औरत’, ‘रोटी’ और ‘मदर इंडिया’ बनी। निहित स्वार्थों के खिलाफ एक पत्रकार के संघर्ष की गाथा बांबे टॉकीज की ‘नया संसार’ में देखने को मिली।
मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ और मणि कौल की ‘उसकी रोटी’ ने फिल्मों को एक नयी लीक दी। इस लीक को नाम दिया गया कला फिल्म या समांतर सिनेमा। इन फिल्मों ने फिल्म के सशक्त माध्यम के सही उपयोग का रास्ता खोल दिया। फिल्में सम
सामयिक समाज की जुबान बन गयीं। अब वह सिर्फ मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रह गयीं। वे सामाजिक संदेश भी देने लगीं। इन फिल्मों में फंतासी के बजाय वास्तविकता पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा। दर्शकों को लगने लगा कि फिल्म के रूप में वे अपने गिर्द घिरी समस्याओं, कुरीतियों और भ्रष्टाचार से साक्षात्कार कर रहे हैं। अब फिल्म उनके लिए महज मनोरंजन का जरिया भर नहीं, बल्कि उस समाज का आईना बन गयी जिसमें वे रहते हैं। इस आईने ने उन्हें श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ , ‘मंथन’, गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’ से समाज की कई ज्वलंत समस्याओं से रूबरू कराया। इस लिहाज से स्मिता पाटील अभिनीत ‘चक्र’ (निर्देशक-रवींद्र धर्मराज) भी मील का पत्थर साबित हुई।इस तरह के सिनेमा को समांतर सिनेमा का नाम दिया गया जहां वास्तविकता को ज्यादा महत्व दिया गया। जीवन के काफी करीब लगने वाली और समय से सही तादात्म्य स्थापित करने वाली इन फिल्मों का दौर लंबं समय तक नहीं चल पाया। तड़क-भड़क, नाच-गाने और ढिशुंग-ढिशंग से भरी फिल्मों के आगे ये असमय ही मृत्यु को प्राप्त हुईं। जीवंत सिनेमा कही जाने वाली इन फिल्मों की वित्तीय मदद के लिए राष्ट्रीय फिल्म वित्त निगम आगे आया, जो बाद में फिल्म विकास निगम बन गया। (आगे पढ़े)

शनिवार, मई 01, 2010

सामाजिक-पारिवारिक समस्याओं पर भी खूब फिल्में बनीं

राजेश त्रिपाठी
  हिंदी सिनेमा का इतिहास-11
 1930-1940 तक के बड़े बैनर थे न्यू थिएटर्स, प्रभात, बांबे टॉकीज, मिनर्वा मूवीटोन’, फिल्मिस्तान, वाडिया ब्रादर्स तथा राजकमल। इन सबने सामाजिक समस्याओं से जुड़ी कई फिल्में बनायीं। उन दिनों औरतों को घर तोड़नेवाली के रूप में भी चित्रित किया जाता था। ‘देवदास’, बी.आर. इशारा की ‘चेतना’, बी.आर. चोपड़ा की ‘साधना’, गुरुदत्त की ‘प्यासा’ इसी दिशा में एक प्रयास था। ‘ चेतना’ नयी धारा की फिल्म बनी और उसके बाद इस तरह की कई फिल्में आयीं। एक फिल्म निर्माता की उपेक्षित जिंदगी पर गुरुदत्त ने ‘कागज के फूल’ बनायी। यह भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म थी। जिसके लिए यंत्र विदेश से मंगाये गये थे। फिल्म की प्रोसेसिंग भी विदेश में हुई थी। दुर्भाग्य से यह फिल्म बुरी तरह से फ्लाप रही। एक फिल्म ‘सोने की चिडि़या’ बनी, जिसमें एक युवा अभिनेत्री की जिंदगी दिखायी गयी थी। हृषिकेश मुखर्जी की ‘गुड्डी’ (एक किशोरी की फिल्म अभिनेताओं के प्रति दीवानगी पर) ,श्याम बनेगल की स्मिता पाटील अभिनीत ‘भूमिका’ (प्रसिद्ध मराठी अभिनेत्री हंसा वाडकर की जिंदगी से प्रेरित), सत्यजित राय की बंगला फिल्म ‘नायक’ (उत्तम कुमार अभिनीत एक फिल्मी नायक की जीवनगाथा) भी अपने वक्त की उल्लेखनीय फिल्में रहीं।
महिलाओं पर केंद्रित कथाओं पर हृषिकेश मुखर्जी की ‘ अनुपमा’, ‘अनुराधा’, सत्यजित राय की ‘चारुलता’, वी. शांताराम की ‘ अमर ज्योति’ (1936) उल्लेखनीय फिल्में कही जायेंगी। ‘बॉबी’ (किशोर प्रेम की किशोर वय कलाकार जोड़ी की फिल्म), ‘तराना’ (एक बनजारन और एक रईस युवक की प्रेमकथा), नासिर हुसेन की ‘ जब प्यार किसी से होता है’, ‘हम किसी से कम नहीं’(1978), बाल विवाह पर कारदार की ‘शारदा’ (1942), वी. शांताराम की 1937 में बनी ‘दुनिया न माने’ (वृद्ध व्यक्ति से युवा लड़की के विवाह के कथानक पर),अज्ञातयौवना की कहानी ‘बालिका वधू’, ‘उपहार’, दहेज प्रथा पर वी. शांताराम की ‘दहेज’ (1950) भी यादगार फिल्में हैं। इसके अलावा बी. आर. चोपड़ा की गीतविहीन फिल्में ‘कानून’, और ‘इत्तिफाक’ सस्पेंस फिल्म के रूप में व राजश्री प्रोडक्शंस की ‘तपस्या’ बड़ी बहन के त्याग की कहानी के लिए याद की जाती रहेंगी। राज कपूर की ‘श्री 420’ में चार्ली चैपलिन की तर्ज पर व्यंग्य करने की कोशिश की गयी थी। 1947 में बनी ‘दूसरी शादी’ दूसरी पत्नी की सांसत झेलती पहली पत्नी की व्यथा-कथा थी। ‘बूटपालिश’ राज कपूर द्वारा निर्मित सफल बाल फिल्म थी। ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ और ‘सौतन’ बलिदान होनेवाली दूसरी औरत की कहानी थी। अवैध संतान की कहानी पर 1959 में बी.आर. चोपड़ा की यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म ‘धूल का फूल’ आयी , जिसका मोहम्मद रफी द्वारा गाया गीत- तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इनसान की औलाद है इनसान बनेगा’ काफी लोकप्रिय हआ था। ‘कुआंरा बाप’ और ‘मस्ताना’ में भी यही कथानक दोहराया गया।(आगे पढ़ें)

शनिवार, अप्रैल 24, 2010

मानवीय रिश्ते भी बने फिल्मों के कथानक का आधार

हिंदी फिल्मों का इतिहास-10
राजेश त्रिपाठी
  नृत्य पर आधारित फिल्मों में उदयशंकर की ‘कल्पना’ और वी. शांताराम की ‘झनक झनक पायल बाजे’ काफी चर्चित रहीं। पारिवारिक समस्याओं को लेकर बनी फिल्मों में गजानन जागीरदार द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ चरणों की दासी सास-बहू के बीच तकरार पर आधारित थी तो बासु चटर्जी निर्देशित फिल्म ‘सारा आकाश’ में एक नव वधू अपने पति के साथ, जो अपने परिवार से बुरी तरह बंधा-जकड़ा है, तादाम्य स्थापित करने की कोशिश करती है। मां, बहन के रिश्तों और घर-परिवार के कथानक पर अनेक फिल्में बनीं। इनमें 1948 में बनी एस एम यूसुफ की ‘गृहस्थी’ भी एक थी। अवाक फिल्मों के युग में चंदूलाल शाह ने ‘गुण सुंदरी’ बनायी। वी. शांताराम की ‘नवरंग’ (सवाक), बी.आर चोपड़ा की ‘गुमराह’ ( एक युवती के वृद्ध से ब्याहे जाने की समस्या पर), ‘ये रास्ते हैं प्यार के’, ‘अनुभव’, ‘अविष्कार’ तथा ‘गृहप्रवेश’ आदि के नाम भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।

अपराध की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्मों का दौर अवाक फिल्मों के युग से ‘काला नाग’ से शुरू हो गया था। इसके निर्देशक थे होमी मास्टर, जिन्होंने इस फिल्म में मुख्य भूमिका भी निभायी थी। सवाक युग में ‘किस्मत’ ( हीरो अशोक कुमार, हीरोइन मुमताज शांति। यह फिल्म कलकत्ता में तकरीबन चार साल तक चली थी, जो एक रिकार्ड है) के गीत भी बहुत हिट हुए थे। ‘दुनिया क्या है’, ‘बाजी’, ‘आर पार’, ‘सीआईडी’, ‘दो आंखे बारह हाथ’ (वी. शांताराम), ‘गंगा यमुना’, ‘मुझे जीने दो’ (डाकुओं की समस्या पर), ‘डॉन’, ‘शोले’ (70 एम. एम. स्टीरियोफोनिक साउंड में बनी भारत की पहली फिल्म।
जी. पी. सिप्पी की रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित इस फिल्म ने कामयाबी के नये कीर्तिमान बनाये) आदि फिल्मों का एक सिलसिला ही चल पड़ा जो आज तक बरकरार है।
फिल्मों ने हिंदू-मुसलिम एकता के विषय को भी आधार बनाया। इस दृष्टि से वी.शांताराम की ‘पड़ोसी’ एक उल्लेखनीय फिल्म थी। इसमें मुसलिम कलाकार को हिंदू की और गजानन जागीरदार को मुसलिम पात्र की भूमिका देकर एक नया प्रयोग किया गया था। सामाजिक समस्याओं भी फिल्मों ने मुंह नहीं चुराया। 1941 में बनी ‘आदमी’ में वेश्यावृत्ति के पेशे को मानवीय नजरिये से देखने का पहला प्रयास किया गया। इसके बाद भी समाज की कुछ ज्वलंत समस्याओं पर फिल्में बनाने का सिलसिला जारी रहा। (आगे पढ़ें)